भारत–ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौते (FTA) में इस्पात कोटा और कार्बन अवरोधों का प्रबंधन

पाठ्यक्रम: जीएस-2/अंतरराष्ट्रीय सम्बन्ध, जीएस-3/ अर्थव्यवस्था 

सन्दर्भ

  • वर्ष 2025 में हस्ताक्षरित द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के अंतर्गत भारत, ब्रिटेन के बाजार में लगभग 90 करोड़ अमेरिकी डॉलर मूल्य के इस्पात कोटे की मांग कर रहा है। इसका उद्देश्य ब्रिटेन द्वारा घोषित इस्पात आयात प्रतिबंधों को लेकर चल रहे विवाद का समाधान करना है।

ब्रिटेन द्वारा इस्पात आयात प्रतिबंधों का कड़ा किया जाना

  • ब्रिटेन ने इस्पात सुरक्षा उपायों (Steel Safeguard Measures) में संशोधन की घोषणा की है, जो 1 जुलाई 2026 से प्रभावी होंगे।
  • ब्रिटेन ने इस्पात उत्पादों के लिए शुल्क-मुक्त आयात कोटा घटा दिया है तथा निर्धारित कोटे से अधिक आयात पर शुल्क को 25% से बढ़ाकर 50% कर दिया है।
  • ब्रिटिश सरकार ने इन उपायों को वैश्विक अतिरिक्त उत्पादन क्षमता (Global Overcapacity) तथा व्यापार विचलन (Trade Diversion) से अपने घरेलू इस्पात उद्योग की रक्षा के लिए आवश्यक बताया है।

भारत द्वारा उठाये गए मुद्दे 

  • भारत का तर्क है कि प्रस्तावित कोटे उसके वर्तमान निर्यात स्तर से काफी कम हैं।
  • वर्ष 2025–26 में ब्रिटेन को भारत के लौह, इस्पात तथा इस्पात उत्पादों का निर्यात लगभग 89.34 करोड़ अमेरिकी डॉलर रहा।
  • भारतीय उद्योग पर प्रभाव:इन प्रतिबंधों का सबसे अधिक प्रभाव भारतीय सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) निर्यातकों पर पड़ेगा।
  • विशेष रूप से स्टेनलेस स्टील वायर रॉड तथा वेल्डेड पाइप जैसे उच्च-निर्भरता वाले इस्पात उत्पाद प्रभावित होंगे, जो ब्रिटेन को भारत के इस्पात निर्यात का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं।

शुल्क-दर कोटा (Tariff-Rate Quota: TRQ) 

  • TRQ आयात को विनियमित करने हेतु प्रयुक्त दो-स्तरीय व्यापार नीति है।
  • इसके अंतर्गत किसी उत्पाद की एक निश्चित मात्रा को कम अथवा शून्य सीमा शुल्क पर आयात करने की अनुमति दी जाती है।
  • निर्धारित मात्रा पूरी हो जाने के बाद अतिरिक्त आयात पर सामान्यतः काफी अधिक सीमा शुल्क लगाया जाता है।
  • TRQ की अवधारणा विश्व व्यापार संगठन के अंतर्गत उरुग्वे दौर कृषि समझौते से विकसित हुई।
  • इसका उद्देश्य गैर-शुल्कीय अवरोधों को अधिक पारदर्शी तथा मापनीय शुल्क-आधारित उपायों में परिवर्तित करना था, जिसे टैरिफीकरण (Tariffication) कहा जाता है।

ब्रिटेन का कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM) 

  • ब्रिटेन 1 जनवरी 2027 से कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (Carbon Border Adjustment Mechanism – CBAM) लागू करने की योजना बना रहा है।
  • प्रारम्भिक चरण में इसके अंतर्गत निम्नलिखित क्षेत्र शामिल होंगे—लौह एवं इस्पात,एल्युमिनियम,सीमेंट,उर्वरक,हाइड्रोजन । 

CBAM के उद्देश्य

  • यह तंत्र कार्बन रिसाव (Carbon Leakage) को रोकने का प्रयास करता है, जिसमें उद्योग अपेक्षाकृत कम कठोर पर्यावरणीय नियमों वाले देशों में उत्पादन स्थानांतरित कर देते हैं।
  • इसका उद्देश्य घरेलू उत्पादकों और विदेशी निर्यातकों के बीच समान प्रतिस्पर्धात्मक परिस्थितियाँ सुनिश्चित करना है।

भारत के लिए चिंताएँ

1.अतिरिक्त लागत का बोझ:

  • विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में भारत का इस्पात क्षेत्र अपेक्षाकृत अधिक कार्बन-गहन है। परिणामस्वरूप भारतीय निर्यातकों को अतिरिक्त अनुपालन लागत तथा कार्बन-संबंधी शुल्कों का सामना करना पड़ सकता है।

2. CBDR सिद्धांत पर प्रभाव

  • CBAM जलवायु वार्ताओं में समान लेकिन विभेदित उत्तरदायित्व (Common But Differentiated Responsibilities – CBDR) के सिद्धांत को कमजोर करता है।
  • भारत का मत है कि विकसित और विकासशील देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारियाँ भिन्न हैं, इसलिए सभी देशों पर समान कार्बन लागत लागू करना न्यायसंगत नहीं है।

हरित इस्पात उत्पादन की दिशा में भारत का संक्रमण

  • भारत वर्ष 2070 तक अपने शुद्ध-शून्य उत्सर्जन (Net Zero) लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु इस्पात क्षेत्र के डी-कार्बनीकरण (Decarbonisation) पर कार्य कर रहा है।
  • इसके लिए निम्नलिखित उपाय अपनाए जा रहे हैं—ऊर्जा दक्षता में वृद्धि,नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग,हरित हाइड्रोजन का प्रयोग,स्क्रैप इस्पात का पुनर्चक्रण,कार्बन अभिग्रहण, उपयोग एवं भंडारण (CCUS) प्रौद्योगिकियाँ आदि । 
  • वर्ष 2024 में भारत आधिकारिक हरित इस्पात वर्गीकरण (Green Steel Taxonomy) प्रस्तुत करने वाला विश्व का पहला देश बना।
  • इसके अनुसार, प्रति टन तैयार इस्पात पर 2.2 टन CO₂ समतुल्य से कम उत्सर्जन तीव्रता वाले इस्पात को हरित इस्पात माना जाता है।
  • मार्च 2026 तक 89 इस्पात इकाइयों को हरित इस्पात प्रमाणन प्रदान किया जा चुका था, जो 12.34 मिलियन टन उत्पादन को कवर करता है।

आगे की राह

  • भारत और ब्रिटेन को ऐतिहासिक व्यापार मात्रा को ध्यान में रखते हुए परस्पर स्वीकार्य इस्पात कोटे पर सहमति बनानी चाहिए।
  • भारत को हरित इस्पात प्रौद्योगिकियों तथा निम्न-कार्बन विनिर्माण प्रक्रियाओं को तेजी से अपनाना चाहिए।
  • यह विवाद मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के अंतर्गत प्रभावी विवाद-निपटान तंत्र विकसित करने का अवसर भी प्रदान करता है।

वैश्विक इस्पात क्षेत्र में भारत की स्थिति

  • वैश्विक कच्चे इस्पात उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी वर्ष 2014 के 5.2% से बढ़कर वर्ष 2024 में 7.9% हो गई, जो उसकी बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को दर्शाती है।
  • विश्व स्टील एसोशिएशन के अनुसार, भारत तैयार इस्पात का विश्व का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता भी है।
  • भारत में तैयार इस्पात की खपत वर्ष 2014–15 के 77 मिलियन टन (MT) से बढ़कर वर्ष 2025–26 में 163.7 मिलियन टन हो गई।
  • मार्च 2026 में भारत के तैयार इस्पात निर्यात के प्रमुख गंतव्य निम्नलिखित थे—वियतनाम, बेल्जियम, ताईवान। ये तीनों मिलकर भारत के कुल तैयार इस्पात निर्यात का 50% से अधिक हिस्सा रखते थे।
  • भारत ने अपनी दीर्घकालिक औद्योगिक विकास रणनीति के अंतर्गत वर्ष 2047 तक 500 मिलियन टन इस्पात उत्पादन क्षमता प्राप्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया है।

Source: IE

 

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